सबसे पहले एक जरूरी तथ्य
भारतीय संविधान को 26 नवम्बर 1949 को अंगीकृत किया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। मूल संविधान में 22 भाग थे। बाद के संशोधनों से IVA, IXA, IXB और XIVA जैसे भाग जोड़े गए तथा मूल Part VII को 1956 में हटाया गया। इसलिए आज के संविधान को केवल 22 क्रमांकित भागों की सूची से समझना अधूरा होगा। इस पुस्तक में पहले मूल 22 भागों का क्रम रखा गया है और जहाँ वर्तमान स्थिति अलग है, वहाँ अलग से बताया गया है।
विषय-सूची — मूल 22 भाग
भाग I — संघ और उसका राज्य-क्षेत्र
यह भाग भारत के नाम, संघ की प्रकृति और राज्य-क्षेत्र की संरचना को निर्धारित करता है। अनुच्छेद 1 भारत को “राज्यों का संघ” कहता है। इसका आशय यह है कि भारतीय संघ राज्यों के बीच किसी ऐसे समझौते का परिणाम नहीं है जिससे राज्यों को संघ से अलग होने का अधिकार मिल जाए।
मुख्य संवैधानिक व्यवस्था
- अनुच्छेद 1: भारत अर्थात इंडिया, राज्यों का संघ; राज्य और उनके क्षेत्र प्रथम अनुसूची में वर्णित हैं।
- अनुच्छेद 2: संसद नए राज्यों को संघ में प्रवेश दे सकती है या नए राज्य स्थापित कर सकती है।
- अनुच्छेद 3: संसद किसी राज्य का क्षेत्र, सीमा या नाम बदलने तथा नया राज्य बनाने के लिए कानून बना सकती है।
- अनुच्छेद 4: अनुच्छेद 2 और 3 के तहत बने कानूनों से प्रथम और चतुर्थ अनुसूची में आवश्यक परिवर्तन किए जा सकते हैं; इन्हें अनुच्छेद 368 वाला संविधान संशोधन नहीं माना जाता।
प्रक्रिया समझें
राज्य पुनर्गठन विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश पर संसद में प्रस्तुत होता है। राष्ट्रपति संबंधित राज्य विधानमंडल से विचार माँगते हैं। राज्य विधानमंडल की राय महत्वपूर्ण है, पर संसद उस राय से बाध्य नहीं होती।
अनुप्रयोग
यदि किसी राज्य के दो जिलों को मिलाकर नया राज्य बनाने का प्रस्ताव हो, तो यह अनुच्छेद 3 के दायरे का विषय होगा। यह केवल प्रशासनिक आदेश से नहीं, संसद के कानून से होगा।
भाग II — नागरिकता
भाग II मुख्यतः संविधान लागू होने के समय नागरिकता की स्थिति से संबंधित था। संविधान ने उस ऐतिहासिक संक्रमण-काल में भारत में निवास, जन्म, वंश और विभाजन के बाद भारत आए या भारत से गए व्यक्तियों की स्थिति के लिए नियम निर्धारित किए।
अनुच्छेदों का सार
- अनुच्छेद 5: संविधान प्रारंभ होने पर नागरिकता के लिए अधिवास तथा जन्म/माता-पिता/निवास से संबंधित शर्तें।
- अनुच्छेद 6–7: पाकिस्तान से भारत आए और भारत से पाकिस्तान गए कुछ व्यक्तियों के संबंध में प्रावधान।
- अनुच्छेद 8: भारत के बाहर रहने वाले भारतीय मूल के कुछ व्यक्तियों की नागरिकता।
- अनुच्छेद 9: स्वेच्छा से विदेशी राज्य की नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता से संबंधित निषेध।
- अनुच्छेद 10: नागरिकता के अधिकारों की निरंतरता, संसद के कानून के अधीन।
- अनुच्छेद 11: संसद को नागरिकता के अर्जन, समाप्ति और अन्य विषयों पर कानून बनाने की शक्ति।
वर्तमान नागरिकता व्यवस्था को समझने के लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 और उसके संशोधनों का अध्ययन भी आवश्यक है। संविधान का भाग II अकेले आज की पूरी प्रक्रिया नहीं बताता।
भाग III — मौलिक अधिकार
मौलिक अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता, गरिमा और लोकतांत्रिक भागीदारी की संवैधानिक सुरक्षा हैं। ये राज्य की शक्ति पर सीमा लगाते हैं और कुछ अधिकारों के माध्यम से व्यक्ति को न्यायालय जाने का प्रभावी उपाय देते हैं।
छह व्यापक श्रेणियाँ
- समानता का अधिकार — अनुच्छेद 14–18।
- स्वतंत्रता का अधिकार — अनुच्छेद 19–22; इसमें अनुच्छेद 21 और 21A का विशेष महत्व है।
- शोषण के विरुद्ध अधिकार — अनुच्छेद 23–24।
- धर्म की स्वतंत्रता — अनुच्छेद 25–28।
- सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार — अनुच्छेद 29–30।
- संवैधानिक उपचार — अनुच्छेद 32।
अधिकारों की प्रकृति
कुछ अधिकार केवल नागरिकों को उपलब्ध हैं, जबकि कुछ सभी व्यक्तियों को। अनुच्छेद 14 और 21 जैसे अधिकार नागरिक और गैर-नागरिक दोनों व्यक्तियों पर लागू होते हैं। अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताएँ भारतीय नागरिकों के लिए हैं। अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं; संविधान में उचित प्रतिबंधों की व्यवस्था है।
पाँच संवैधानिक रिट
- बंदी प्रत्यक्षीकरण: अवैध हिरासत की वैधता की न्यायिक जाँच।
- परमादेश: सार्वजनिक कर्तव्य निभाने का आदेश।
- प्रतिषेध: अधीनस्थ न्यायाधिकरण को अधिकार-सीमा से बाहर कार्यवाही रोकने का आदेश।
- उत्प्रेषण: अधीनस्थ न्यायिक/अर्ध-न्यायिक आदेश को निरस्त करने हेतु उच्चतर न्यायालय का आदेश।
- अधिकार-पृच्छा: किसी सार्वजनिक पद पर अधिकार के दावे की वैधता पूछना।
अनुच्छेद 32 सर्वोच्च न्यायालय और अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को रिट अधिकारिता देता है। उच्च न्यायालय की रिट शक्ति मौलिक अधिकारों के अतिरिक्त अन्य विधिक अधिकारों के लिए भी प्रयोग हो सकती है।
भाग IV — राज्य के नीति-निदेशक तत्व
नीति-निदेशक तत्व राज्य को सामाजिक और आर्थिक न्याय पर आधारित कल्याणकारी व्यवस्था बनाने की दिशा देते हैं। ये न्यायालय द्वारा सीधे प्रवर्तनीय नहीं हैं, पर शासन में मूलभूत माने गए हैं। मौलिक अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं, जबकि नीति-निदेशक तत्व सामाजिक परिस्थितियों को बेहतर बनाने के लिए राज्य को मार्गदर्शन देते हैं।
मुख्य अनुच्छेद
- अनुच्छेद 38: लोककल्याण के लिए सामाजिक व्यवस्था।
- अनुच्छेद 39: आजीविका, संसाधनों का न्यायसंगत वितरण और समान वेतन सहित नीति-निर्देश।
- अनुच्छेद 39A: समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता।
- अनुच्छेद 40: ग्राम पंचायतों का संगठन।
- अनुच्छेद 44: समान नागरिक संहिता के लिए राज्य का प्रयास।
- अनुच्छेद 45: छह वर्ष से कम आयु के बच्चों की प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा।
- अनुच्छेद 48A: पर्यावरण, वन और वन्यजीवों की रक्षा।
- अनुच्छेद 50: न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करना।
- अनुच्छेद 51: अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा।
मौलिक अधिकार बनाम नीति-निदेशक तत्व
दोनों संविधान के पूरक अंग हैं। न्यायालयों ने समय के साथ इनके बीच संतुलन पर जोर दिया है। राज्य नीति बनाते समय मौलिक अधिकारों का सम्मान करते हुए नीति-निदेशक तत्वों को लागू करने का प्रयास करता है।
भाग V — संघ
भाग V संघीय शासन की केंद्रीय संस्थाओं को व्यवस्थित करता है। इसमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद, संसद, सर्वोच्च न्यायालय और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक से संबंधित प्रावधान आते हैं। भारत में संसदीय प्रणाली है: राष्ट्रपति संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष हैं और प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद वास्तविक राजनीतिक कार्यपालिका है।
राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति
राष्ट्रपति का निर्वाचन निर्वाचक मंडल द्वारा होता है; कार्यकाल पाँच वर्ष है। राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों में नियुक्तियाँ, संसद से संबंधित कार्य, विधेयकों पर स्वीकृति, अध्यादेश और क्षमादान संबंधी प्रावधान शामिल हैं। सामान्यतः इनका प्रयोग संविधान और मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार होता है। उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं।
प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद
अनुच्छेद 74 मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह का प्रावधान करता है। अनुच्छेद 75 नियुक्ति, पदावधि और सामूहिक उत्तरदायित्व से संबंधित है। मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है। प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद के नेता और सरकार के प्रमुख समन्वयक होते हैं।
संसद
संसद राष्ट्रपति, लोकसभा और राज्यसभा से मिलकर बनती है। लोकसभा जनता का प्रत्यक्ष निर्वाचित सदन है। राज्यसभा स्थायी सदन है और उसके सदस्य चरणबद्ध तरीके से सेवानिवृत्त होते हैं। धन विधेयक केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है; राज्यसभा उसे 14 दिनों के भीतर सिफारिशों सहित लौटा सकती है।
सर्वोच्च न्यायालय और CAG
अनुच्छेद 124 सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना और संरचना से संबंधित है। अनुच्छेद 141 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि को भारत के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी बनाता है। अनुच्छेद 148 CAG का प्रावधान करता है, जो सार्वजनिक वित्तीय जवाबदेही में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भाग VI — राज्य
भाग VI राज्यों की कार्यपालिका, विधानमंडल और उच्च न्यायालयों की संवैधानिक व्यवस्था बताता है। राज्यपाल राज्य के संवैधानिक प्रमुख हैं; मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद राज्य की राजनीतिक कार्यपालिका चलाते हैं।
राज्यपाल और मंत्रिपरिषद
राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। सामान्य कार्यकाल पाँच वर्ष का है, पर पद राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत रहता है। मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं। मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है।
राज्य विधानमंडल
राज्य में एक सदन या दो सदन हो सकते हैं। विधानसभा प्रत्यक्ष निर्वाचित सदन है। जहाँ विधान परिषद है, वहाँ वह स्थायी सदन है। विधायी शक्तियों का वितरण सातवीं अनुसूची और संविधान के अन्य प्रावधानों के अनुसार होता है।
उच्च न्यायालय
अनुच्छेद 214 राज्यों के लिए उच्च न्यायालयों का प्रावधान करता है। अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने की शक्ति देता है। उच्च न्यायालय की अधिकारिता केवल मौलिक अधिकारों तक सीमित नहीं है।
भाग VII — प्रथम अनुसूची के भाग B के राज्य
मूल संविधान में भाग VII उन राज्यों से संबंधित था जिन्हें प्रथम अनुसूची के भाग B में रखा गया था। राज्यों के पुनर्गठन और संवैधानिक ढाँचे में परिवर्तन के बाद सातवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 द्वारा इसे निरसित कर दिया गया।
भाग VIII — संघ राज्य-क्षेत्र
संघ राज्य-क्षेत्रों का प्रशासन राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त प्रशासक के माध्यम से किया जाता है। कुछ संघ राज्य-क्षेत्रों में विधानमंडल और मंत्रिपरिषद की विशेष व्यवस्था है। दिल्ली के लिए अनुच्छेद 239AA विशेष संवैधानिक व्यवस्था प्रदान करता है।
राज्यों और संघ राज्य-क्षेत्रों के बीच मुख्य अंतर प्रशासनिक और संवैधानिक संरचना का है। प्रत्येक संघ राज्य-क्षेत्र की व्यवस्था समान नहीं होती; संबंधित संवैधानिक प्रावधान और संसद के कानून लागू होते हैं।
भाग IX — पंचायतें
73वें संशोधन ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक आधार दिया। ग्राम सभा स्थानीय लोकतंत्र का आधार है। सामान्य ढाँचे में ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तर की पंचायतें शामिल होती हैं; छोटे राज्यों के लिए मध्यवर्ती स्तर संबंधी अपवाद है।
- पंचायतों का सामान्य कार्यकाल पाँच वर्ष।
- SC/ST के लिए जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण तथा महिलाओं के लिए कम-से-कम एक-तिहाई आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान; राज्य कानून अधिक आरक्षण दे सकते हैं।
- राज्य निर्वाचन आयोग पंचायत चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण करता है।
- राज्य वित्त आयोग प्रत्येक पाँच वर्ष में स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए गठित किया जाता है।
- ग्यारहवीं अनुसूची में पंचायतों से संबंधित 29 विषय हैं।
पंचायतों को वास्तविक अधिकार, कार्य और वित्त राज्य कानूनों के माध्यम से मिलते हैं। संविधान ढाँचा देता है, पर व्यवहार में राज्यों के बीच अधिकारों का स्तर अलग हो सकता है।
भाग X — अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्र
यह भाग अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विशेष संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ा है। पाँचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन एवं नियंत्रण से संबंधित है। छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिए स्वायत्त जिला/क्षेत्रीय परिषदों की व्यवस्था करती है।
मुख्य अंतर
पाँचवीं अनुसूची का ढाँचा राज्यपाल और जनजातीय सलाहकार परिषद सहित विशेष प्रशासनिक उपायों पर आधारित है। छठी अनुसूची में कुछ क्षेत्रों को स्थानीय स्वशासन के लिए विधायी, न्यायिक और वित्तीय शक्तियों वाली स्वायत्त परिषदें दी जाती हैं।
भाग XI — संघ और राज्यों के संबंध
भारत में विधायी और प्रशासनिक शक्तियों का वितरण संघीय ढाँचे के भीतर किया गया है। सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची हैं। संसद संघ सूची पर, राज्य विधानमंडल राज्य सूची पर और दोनों समवर्ती सूची पर कानून बना सकते हैं, पर टकराव की स्थिति में अनुच्छेद 254 सहित संवैधानिक नियम लागू होते हैं।
विधायी संबंध
- अनुच्छेद 245: संसद और राज्य विधानमंडलों के कानूनों का क्षेत्रीय विस्तार।
- अनुच्छेद 246: संघ, राज्य और समवर्ती सूचियों के आधार पर विधायी विषयों का वितरण।
- अनुच्छेद 248: अवशिष्ट विधायी शक्तियाँ संसद को।
- अनुच्छेद 249: राष्ट्रीय हित में राज्य सूची के विषय पर संसद की विधायी शक्ति, राज्यसभा के विशेष प्रस्ताव के आधार पर।
- अनुच्छेद 250: राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान राज्य सूची पर संसद की शक्ति।
- अनुच्छेद 252: दो या अधिक राज्यों के अनुरोध पर संसद का कानून।
- अनुच्छेद 263: अंतरराज्यीय परिषद की स्थापना का प्रावधान।
सहकारी संघवाद का अर्थ है कि केंद्र और राज्य साझा राष्ट्रीय लक्ष्यों के लिए सहयोग करें। प्रतिस्पर्धी संघवाद में राज्य निवेश, सेवाओं और विकास संकेतकों में बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
भाग XII — वित्त, संपत्ति, संविदाएँ और वाद
यह भाग सार्वजनिक वित्त, करों के वितरण, वित्त आयोग, सरकारी संपत्ति, अनुबंध और मुकदमों से जुड़े प्रावधानों को समेटता है। संघीय व्यवस्था में राजस्व के स्रोत और व्यय की जिम्मेदारियाँ अलग-अलग स्तरों पर बाँटी गई हैं।
- अनुच्छेद 265: कानून के प्राधिकार के बिना कोई कर न लगाया जाएगा, न वसूला जाएगा।
- अनुच्छेद 280: राष्ट्रपति द्वारा वित्त आयोग का गठन; यह केंद्र और राज्यों के बीच कर-वितरण तथा अनुदानों पर सिफारिशें करता है।
- अनुच्छेद 279A: GST परिषद।
- अनुच्छेद 300: संघ और राज्यों द्वारा/के विरुद्ध वाद।
- अनुच्छेद 300A: कानून के प्राधिकार के बिना किसी व्यक्ति को संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा।
वित्त आयोग और GST परिषद
वित्त आयोग संवैधानिक निकाय है। GST परिषद संघ और राज्यों के बीच अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था पर सहयोग का मंच है। दोनों की भूमिका, संरचना और सिफारिशों की प्रकृति अलग है।
भाग XIII — भारत के भीतर व्यापार, वाणिज्य और समागम
इस भाग का उद्देश्य पूरे भारत में व्यापार, वाणिज्य और आवागमन की स्वतंत्रता को संवैधानिक आधार देना है। यह राष्ट्रीय आर्थिक एकता को बढ़ावा देता है। यह स्वतंत्रता पूर्णतः असीमित नहीं है; संविधान सार्वजनिक हित और अन्य निर्दिष्ट आधारों पर उचित प्रतिबंधों की अनुमति देता है।
- अनुच्छेद 301: भारत के क्षेत्र में व्यापार, वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता।
- अनुच्छेद 302: संसद सार्वजनिक हित में प्रतिबंध लगा सकती है।
- अनुच्छेद 303: राज्यों के बीच भेदभावपूर्ण प्राथमिकता/प्रतिबंधों पर सामान्य निषेध, निर्धारित अपवादों सहित।
- अनुच्छेद 304: राज्य अन्य राज्यों से आने वाले माल पर गैर-भेदभावपूर्ण कर और उचित प्रतिबंध लगा सकते हैं, संवैधानिक शर्तों के अधीन।
इस भाग को GST, राष्ट्रीय बाजार और संघीय आर्थिक संबंधों के साथ जोड़कर पढ़ना उपयोगी है।
भाग XIV — संघ और राज्यों के अधीन सेवाएँ
यह भाग सरकारी सेवाओं में नियुक्ति, सेवा-शर्तों और लोक सेवा आयोगों की व्यवस्था से संबंधित है। अनुच्छेद 309 संसद और राज्य विधानमंडलों को भर्ती तथा सेवा-शर्तों के नियमन के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है। अनुच्छेद 310 प्रसादपर्यंत सिद्धांत से और अनुच्छेद 311 कुछ सिविल सेवकों को बर्खास्तगी, हटाने या पदावनति के संबंध में सुरक्षा से जुड़ा है।
लोक सेवा आयोग
अनुच्छेद 315 संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोगों का प्रावधान करता है। UPSC और राज्य लोक सेवा आयोग भर्ती प्रक्रियाओं में संवैधानिक भूमिका निभाते हैं। अनुच्छेद 320 आयोगों के कार्यों से संबंधित है।
भाग XV — निर्वाचन
लोकतंत्र में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रतिनिधि शासन की वैधता का आधार हैं। अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी देता है।
- अनुच्छेद 325: धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर किसी व्यक्ति को सामान्य निर्वाचक सूची से बाहर नहीं किया जा सकता।
- अनुच्छेद 326: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर।
- अनुच्छेद 327: संसद की चुनाव संबंधी कानून बनाने की शक्ति।
- अनुच्छेद 328: राज्य विधानमंडल की चुनाव संबंधी कानून बनाने की शक्ति, संसद के कानूनों के अधीन।
- अनुच्छेद 329: चुनावी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर संवैधानिक सीमाएँ।
निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग अलग संस्थाएँ हैं। पहला संसद/विधानसभा और राष्ट्रपति/उपराष्ट्रपति चुनावों से जुड़ा है; दूसरा पंचायत और नगरपालिका चुनावों से।
भाग XVI — कुछ वर्गों के संबंध में विशेष उपबंध
यह भाग अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों से संबंधित कुछ संवैधानिक व्यवस्थाओं को शामिल करता है। इसमें संसद और विधानसभाओं में आरक्षण, आयोगों तथा वर्गों की पहचान से जुड़े प्रावधान हैं।
- अनुच्छेद 330: लोकसभा में SC/ST के लिए सीटों का आरक्षण।
- अनुच्छेद 332: राज्य विधानसभाओं में SC/ST के लिए सीटों का आरक्षण।
- अनुच्छेद 338: राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग।
- अनुच्छेद 338A: राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग।
- अनुच्छेद 338B: राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग।
- अनुच्छेद 341 और 342: SC/ST की सूची से संबंधित राष्ट्रपति और संसद की भूमिका।
- अनुच्छेद 342A: सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों से संबंधित प्रावधान।
आरक्षण संबंधी किसी वर्तमान नीति या पात्रता के लिए संविधान के साथ-साथ लागू केंद्रीय/राज्य कानून और नवीनतम सरकारी अधिसूचना देखना आवश्यक है।
भाग XVII — राजभाषा
भाग XVII संघ की राजभाषा, राज्यों की भाषाओं, न्यायालयों और विधायी पाठों की भाषा तथा हिंदी के विकास से संबंधित प्रावधान देता है। अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी है; अंकों के रूप के संबंध में भी संवैधानिक प्रावधान है। अंग्रेजी के उपयोग को जारी रखने के लिए संसद ने कानून बनाया है।
- अनुच्छेद 345: राज्य की राजभाषा/राजभाषाओं के संबंध में राज्य विधानमंडल का प्रावधान।
- अनुच्छेद 348: सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों और विधेयकों/अधिनियमों के प्राधिकृत पाठ में अंग्रेजी के उपयोग से संबंधित व्यवस्था।
- अनुच्छेद 350A: भाषायी अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों को प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाओं का प्रयास।
- अनुच्छेद 351: हिंदी भाषा के विकास के लिए संघ का निर्देश।
भाग XVIII — आपात उपबंध
आपातकालीन प्रावधान असाधारण राष्ट्रीय परिस्थितियों में शासन की निरंतरता और सुरक्षा के लिए हैं। इनका उपयोग कठोर संवैधानिक शर्तों और संसदीय नियंत्रण के अधीन है।
- अनुच्छेद 352: युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल।
- अनुच्छेद 356: राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर राष्ट्रपति शासन।
- अनुच्छेद 360: वित्तीय आपातकाल।
44वें संशोधन ने आपातकालीन शक्तियों के उपयोग पर सुरक्षा उपाय मजबूत किए। राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा के लिए मंत्रिमंडल की लिखित सलाह और संसद की निर्धारित स्वीकृति आवश्यक है। वित्तीय आपातकाल भारत में अब तक घोषित नहीं हुआ है।
भाग XIX — विविध
इस भाग में राष्ट्रपति और राज्यपाल की पदगत प्रतिरक्षा, कुछ संवैधानिक संस्थाओं/विवादों और संविधान की व्याख्या में प्रयुक्त परिभाषाओं से संबंधित प्रावधान हैं। अनुच्छेद 361 राष्ट्रपति और राज्यपाल को पद के दौरान कुछ न्यायिक कार्यवाहियों से सीमित संरक्षण देता है; इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार या राज्य की हर कार्रवाई न्यायिक समीक्षा से बाहर हो जाती है।
अनुच्छेद 366 में कई संवैधानिक शब्दों की परिभाषाएँ हैं और अनुच्छेद 367 व्याख्या से संबंधित है। इन अनुच्छेदों को पढ़ते समय सामान्य बोलचाल के अर्थ और संवैधानिक परिभाषा के अंतर को समझना चाहिए।
भाग XX — संविधान संशोधन
संविधान संशोधन की प्रक्रिया संविधान को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप विकसित होने देती है, साथ ही उसकी मूल पहचान की रक्षा भी करती है। संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है; कुछ संघीय विषयों में कम-से-कम आधे राज्यों की विधानसभाओं द्वारा अनुमोदन भी आवश्यक है।
मूल संरचना सिद्धांत
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन उसकी मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती। लोकतंत्र, गणराज्य, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, न्यायिक समीक्षा और संविधान की सर्वोच्चता जैसे तत्व इस सिद्धांत की चर्चा में आते हैं।
भाग XXI — अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबंध
यह भाग संविधान लागू होने के समय प्रशासनिक संक्रमण, कुछ राज्यों/क्षेत्रों के लिए विशेष व्यवस्थाओं और अस्थायी प्रावधानों को समेटता है। अनुच्छेद 370 ऐतिहासिक रूप से जम्मू-कश्मीर के संबंध में विशेष प्रावधान से जुड़ा था; 2019 के संवैधानिक और विधायी कदमों के बाद उसकी वर्तमान स्थिति को आधिकारिक सरकारी आदेशों तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के संदर्भ में पढ़ना चाहिए।
अनुच्छेद 371 और उससे जुड़े उपबंध कुछ राज्यों के लिए विशेष प्रशासनिक/विकास संबंधी व्यवस्थाएँ प्रदान करते हैं। इनका उद्देश्य क्षेत्रीय परिस्थितियों, ऐतिहासिक समझौतों और प्रतिनिधित्व संबंधी आवश्यकताओं को ध्यान में रखना है।
भाग XXII — संक्षिप्त नाम, प्रारंभ, हिंदी में प्राधिकृत पाठ और निरसन
अंतिम भाग संविधान के संक्षिप्त नाम, प्रारंभ, हिंदी में प्राधिकृत पाठ और पुराने कानूनों के निरसन से संबंधित है। अनुच्छेद 393 संविधान का नाम बताता है। अनुच्छेद 394 लागू होने की तिथि से संबंधित है। अनुच्छेद 394A हिंदी भाषा में प्राधिकृत पाठ से जुड़ा है। अनुच्छेद 395 ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 और भारत सरकार अधिनियम, 1935 सहित निर्दिष्ट पुराने संवैधानिक कानूनों को निरस्त किया।
बाद में जोड़े गए भाग और वर्तमान संविधान की संरचना
मूल 22 भागों के अलावा बाद में चार भाग जोड़े गए:
- भाग IVA — मौलिक कर्तव्य: अनुच्छेद 51A; 42वाँ संशोधन, 1976।
- भाग IXA — नगरपालिकाएँ: अनुच्छेद 243P–243ZG; 74वाँ संशोधन, 1992।
- भाग IXB — सहकारी समितियाँ: अनुच्छेद 243ZH–243ZT; 97वाँ संशोधन, 2011; इसकी प्रयोज्यता पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय भी पढ़ें।
- भाग XIVA — अधिकरण: अनुच्छेद 323A–323B; 42वाँ संशोधन, 1976।
भाग VII को 7वें संशोधन, 1956 से निरसित किया गया। इस प्रकार आज की प्रचलित संरचना में 25 सक्रिय भाग गिने जाते हैं। मूल 22 भागों को पढ़ते समय बाद में जोड़े गए भागों को छोड़ना नहीं चाहिए।
12 अनुसूचियों का परिचय
- राज्य और केंद्रशासित प्रदेश।
- संवैधानिक पदाधिकारियों के वेतन-भत्ते आदि।
- शपथ और प्रतिज्ञान के प्रारूप।
- राज्यसभा में सीटों का आवंटन।
- अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातियों का प्रशासन।
- चार पूर्वोत्तर राज्यों के निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन।
- संघ, राज्य और समवर्ती सूचियाँ।
- मान्यता प्राप्त भाषाएँ।
- कुछ अधिनियमों/विनियमों से संबंधित प्रावधान।
- दल-बदल विरोधी प्रावधान।
- पंचायतों के विषय।
- नगरपालिकाओं के विषय।
अध्यायवार अभ्यास — नमूना प्रश्न
मुख्य परीक्षा के लिए लेखन अभ्यास
- “भारत राज्यों का संघ है” — इस कथन की संवैधानिक और संघीय व्याख्या कीजिए।
- मौलिक अधिकार और नीति-निदेशक तत्वों के बीच संतुलन का महत्व समझाइए।
- भारतीय संघवाद में वित्त आयोग और GST परिषद की भूमिकाओं की तुलना कीजिए।
- 73वें और 74वें संशोधनों ने स्थानीय स्वशासन को किस प्रकार मजबूत किया?
- मूल संरचना सिद्धांत संसद की संशोधन शक्ति पर किस प्रकार सीमा लगाता है?
अगले संस्करण में जोड़े जाने वाले उन्नत अध्याय
- प्रत्येक भाग के सभी महत्वपूर्ण अनुच्छेदों की clause-wise व्याख्या।
- संविधान सभा की बहसों और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का चयनित अध्ययन।
- महत्वपूर्ण सर्वोच्च न्यायालय निर्णय: तथ्य, प्रश्न, निर्णय और परीक्षा-महत्व।
- UPPSC/UPSSSC के आधिकारिक पुराने प्रश्नपत्रों से विषयवार PYQ विश्लेषण।
- प्रत्येक भाग के 25–50 व्याख्यायुक्त MCQ और उत्तर-लेखन मॉडल।
स्रोत प्राथमिकता: भारत सरकार का विधायी विभाग और India Code पर प्रकाशित संविधान का आधिकारिक पाठ; न्यायिक निर्णयों के लिए सर्वोच्च न्यायालय के आधिकारिक निर्णय। परीक्षा के नवीनतम पाठ्यक्रम/नोटिस संबंधित आयोग की वेबसाइट से जाँचें।